विपक्ष को दिया बड़ा झटका, एक साथ किया इतने सारे सांसदों को राज्यसभा से निलंबित

राज्यसभा ने अपने शीतकालीन सत्र के पहले दिन सांसदों पर बड़ी कार्रवाई की है। संसद के मानसून सत्र

राज्यसभा ने अपने शीतकालीन सत्र के पहले दिन सांसदों पर बड़ी कार्रवाई की है। संसद के मानसून सत्र में हंगामे और अनुशासन का पालन ना करने के आऱोप में राज्यभा के 12 सासंदों को निलंबित कर दिया गया है। इसी के साथ आपको बता दें कि शीतकालीन सत्र के की कार्यवाही कल तक के लिए स्थगित कर दी गई है। जिनको निलंबित किया गया है उनमें कांग्रेस, टीएमसी, शिवसेना, सीपीएम के सांसद शामिल हैं। 
इन सासंद को किया गया निलंबित
प्रियंका चतुर्वेदी और डोना सेन के अलावा सोमवार को निलंबित किए गए सांसदों में एलाराम करीम (सीपीएम), कांग्रेस की फूलो देवी नेताम, छाया वर्मा, आर बोरा, राजमणि पटेल, सैयद नासिर हुसैन, अखिलेश प्रसाद सिंह, CPI के बिनॉय विश्वम, टीएमसी के शांता छेत्री और शिवसेना के अनिल देसाई शामिल हैं. निलंबन नोटिस में कहा गया है कि सांसदों ने 11 अगस्त को मानसून सत्र के आखिरी दिन अपने हिंसक व्यवहार से और सुरक्षाकर्मियों पर जानबूझकर किए गए हमलों से सदन की गरिमा को ठेस पहुंचाई है।
पिछले सत्र के दौरान हुए हंगामे पर हुई कार्रवाई
ये वही सांसद हैं जिन्होंने पिछले सत्र में किसान आंदोलन एवं अन्य कई मुद्दों के बहाने संसद के उच्च सदन में खूब हंगाम मचाया था। उस दौरान इन सांसदों ने उप-सभापति हरिवंश पर कागज फेंका था और सदन के कर्मचारियों के सामने रखी टेबल पर चढ़ गए थे। इन सांसदों पर कार्रवाई की मांग की गई थी जिस पर राज्यसभा के सभापति एम. वेंकैया नायडू को फैसला लेना था।
 संसद सत्र 
आज जब संसद सत्र फिर से शुरू हुआ तो सभापति एम. वेंकैया नायडू ने अपना फैसला सुना दिया। ध्यान रहे कि राज्यसभा में इन विपक्षी सांसदों का बेहद अमर्यादित व्यवहार का जिक्र करते हुए सभापति भावुक हो गए थे। इसलिए उम्मीद की जा रही थी कि सभापति इस संबंध में कोई कड़ा और बड़ा फैसला लेंगे।
राज्यसभा के फैसले से नाराज शिवसेना सांसद 
राज्यसभा द्वारा की गई कार्रवाई पर शिवसेना सांसद प्रियंका चतुर्वेदी ने कहा, ‘अगर आप सीसीटीवी फुटेज देखें तो यह रिकॉर्डेड है कि कैसे पुरुष मार्शलों ने महिला सांसदों के साथ धक्का-मुक्की की थी। एक तरफ ये सब और दूसरी तरफ आपका फैसला? यह कैसा असंसदीय व्यवहार है?’ उन्होंने आगे कहा, ‘डिस्ट्रिक्ट कोर्ट से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक, वहां भी आरोपी की बात को सुना जाता है. उनके लिए वकील भी उपलब्ध कराए जाते हैं। कभी-कभी सरकारी अधिकारियों को उनका पक्ष लेने के लिए भेजा जाता है, मगर यहां हमारा पक्ष नहीं लिया गया।’

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