दिल खुश कर देंगे Mirza Ghalib के ये सदाबहार शेर, एक बार जरुर पढ़ें - Punjab Kesari
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दिल खुश कर देंगे Mirza Ghalib के ये सदाबहार शेर, एक बार जरुर पढ़ें

Mirza Ghalib Poetry: इश्क़ पर ज़ोर नहीं है ये वो आतिश ‘ग़ालिब’
कि लगाए न लगे और…

ये न थी हमारी क़िस्मत कि विसाल-ए-यार होता 
अगर और जीते रहते यही इंतिज़ार होता

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इश्क़ पर ज़ोर नहीं है ये वो आतिश ‘ग़ालिब’ 
कि लगाए न लगे और बुझाए न बने

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न था कुछ तो ख़ुदा था कुछ न होता तो ख़ुदा होता

डुबोया मुझ को होने ने न होता मैं तो क्या होता

आईना देख अपना सा मुँह ले के रह गए, 
साहब को दिल न देने पे कितना ग़ुरूर था

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मोहब्बत में नहीं फर्क जीने और मरने का
उसी को देखकर जीते है जिस ‘काफ़िर’ पे दम निकले

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ये हम जो हिज्र में दीवार-ओ-दर को देखते है
कभी सबा को, कभी नामाबर को देखते है

बना कर फकीरों का हम भेस ग़ालिब
तमाशा-ए-अहल-ए-करम देखते है

ये रश्क है कि वो होता है हमसुख़न हमसे
वरना ख़ौफ़-ए-बदामोज़ी-ए-अदू क्या है

रगों में दौड़ते फिरने के हम नहीं क़ायल
जब आँख ही से न टपका तो फिर लहू क्या है

हम को उन से वफ़ा की है उम्मीद

जो नहीं जानते वफ़ा क्या है

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